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पृथ्वी के नीचे उपलब्ध जल में से 0.25 प्रतिशत ही निकालकर ऊपर लाया जा सकता है
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गुना | 21-अप्रैल-2017
 
   पृथ्वी की सतह का लगभग 70 प्रतिशत भाग जल से ढंका हुआ है और पृथ्वी पर उपलब्ध 97.2 प्रतिशत जल समुद्रों में है, जो पीने के योग्य नहीं है। यह कहना है कार्यपालन यंत्री जल संसाधन श्री राजेश चौरसिया का।
   कार्यपालन यंत्री श्री चौरसिया ने बताया कि जल को अन्न की अपेक्षा अधिक उत्कृष्ट माना गया है। जल तीन रूपों ठोस (बर्फ), द्रव्य (जल) एवं गैस (जलवाष्प) के रूप में पाया जाता है। उपलब्ध जल का केवल 2.8 प्रतिशत जल ही पीने योग्य है। इसमें से 2.2 प्रतिशत पृथ्वी की सतह पर है तथा शेष 0.6 प्रतिशत पृथ्वी के भीतर भू-जल के रूप में है। सतह पर उपलब्ध 2.2 प्रतिशत जल में से 2.15 प्रतिशत जल ग्लेशियरों एवं हिमनदों के रूप में है। मात्र 0.05 प्रतिशत जल झीलों तथा नदियों में है। पृथ्वी के नीचे जितना जल है, उसमें से मात्र 0.25 प्रतिशत ही निकालकर ऊपर लाया जा सकता है।
   जल स्त्रोतो में वर्षा, समुद्र, नदी, कुंआ, बावड़ी, झरना, झील, तालाब, ग्लेशियर एवं भू-गर्भीय जल सम्मिलित हैं। पृथ्वी पर कुल जल उपयोग का 69 प्रतिशत जल सिंचाई के लिए उपयोग होता है। पृथ्वी पर जल उपयोग का 15 प्रतिशत जल का उपयोग औद्योगिक है।
   कार्यपालन यंत्री श्री चौरसिया ने बताया कि जल का गहराता संकट निःसंदेह निर्बाध गति से बढ़ती जनसंख्या है। ग्रामीण आबादी का शहरों और महानगरों की ओर पलायन भी विकासशील देशों के शहरों में पानी की कमी को बढ़ा रहा है। व्यावसायिक गतिविधियों का विस्तार भी जलसंकट का एक कारण है। जलवायु परिवर्तन भी जल संसाधनों पर प्रभाव डालता है। भारत में 60 प्रतिशत सिंचाई हेतु जल और लगभग 85 प्रतिशत पेयजल का स्त्रोत भू-जल ही है, जिसके फलस्वरूप भू-जल की उपलब्धता में गिरावट आ रही है। भू-जल की उपलब्धता में आ रही कमी के फलस्वरूप भू-जल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
   जल संकट दूर करने के लिए जल संरक्षण एवं संचयन आज की ज्वलंत आवश्यकता है। जिसके लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। इसके लिए सामुदायिक एवं व्यक्तिगत स्तर पर निष्ठा के साथ कार्य करना होगा। गुना जिले में वर्ष 2016-017 में जल संसाधन विभाग के स्त्रोतो से 38787 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई गई। जिस प्रकार धन बचाना धन अर्जन के समान है, उसी प्रकार जल बचाना भी जल संग्रहण की भांति है। जो जल संग्रहण एवं संरक्षण में भागीदारी नहीं कर सकते, वो हितग्राही के रूप में जल का मितव्ययतापूर्वक उपयोग कर इस कार्य में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
 
(236 days ago)
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