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जिन्दगी के थपेडों ने जीना सिखा दिया "सफलता की कहानी"
बच्चों की शिक्षा के साथ सुरक्षित भविष्य की बुन रही ताना बाना, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर राजकुमारी एवं फूलबाई कोल को किया गया सम्मानित
अनुपपुर | 12-अक्तूबर-2017
 
  
   ख्वाब टूटे हैं मगर, हौंसले अभी जिंदा हैं। मैं वह नारी हूं जिससे मुश्किलें भी शर्मिदा है,यह बात अनूपपुर रेलवे स्टेशन पर सहायक(कुली) का कार्य कर रही दो माताएं 36 वर्षीय बेबा राजकुमारी सतनामी और 40वर्षीय फूलबाई कोल की है। जिन्होंने अपने जीवन की आधी सफर भी तय नहीं की थी कि उनके पति ने उनका साथ छोड़ दिया। और फिर छोटे-छोटे बच्चों की परवरिश के साथ खुद को सुरक्षित भविष्य का ताना बाना बुनने अपने ही हाथों पर यकीन रखकर यात्रियों के समानों का बोझ उठाना शुरू कर दिया। आधुनिक भारत की नारियों से इतर दोनों ही मातृशक्तियों के जीवन का सफर आज भी बातों ही बात में आंखों में आंसू लिए, फिर खिल-खिलाकर हंसने पर समाप्त हो जाता है। राजकुमारी सतनामी का कहना है कि जब वह पहली बार प्लेटफार्म पर कुली का काम करने पहुंची तो सिर पर पल्लू रखकर प्लेटफार्म पर आती जाती ट्रेनों के खिड़कियों की ओर झांकती, जहां उसे लगता कि कोई उसे समान उठाने के लिए आवाज देगा। लेकिन बाद में खुद ही वह लोगों के समान ढोने के लिए आवाज देना शुरू कर दी। अब तो रोज की आदत सी पड़ गई। वहीं फुलबाई कोल अपने पति के मौत के बाद प्लेटफार्म पर काम के लिए पहुंची तो लोगों की भीड़ के बावजूद वह खुद को अकेलापन पाते प्लेटफार्म पर बैठकर खूब रोती। जिसे चुप कराने स्टेशन के कर्मचारी व बाबू तक आते और उसे समझाते हुए खुद ही जीवन की लड़ाईयों से लडने की नसीहत देते। हालांकि अनूपपुर रेलवे जंक्शन पर दो दर्जन सहायकों (कुली) की उपस्थिति के बाद भी महिला सहायकों में ये महिलाएं यात्रियों के बोझ उठाने में किसी से कम नहीं। रोजाना 250-300 रूपए तक की मेहताना कमाने वाली महिला अब इस कार्य को खुद के परवरिश का बेहतर व सुरक्षित पेशा मान रही है। जहां अपने साथ अपने बच्चों को शिक्षा और आगामी रोजगार में भविष्य तलाश रही है।
   इन मातृशक्तियों में 36 वर्षीय 5वीं कक्षा तक पढ़ी राजकुमारी सतनामी अनूपपुर निवासी का कहना है कि उनकी शादी 15-16 वर्ष की उम्र में वर्ष 2000 में रामकुमार सतनामी से हुई थी। पति अनूपपुर रेलवे स्टेशन पर ही कुली का कार्य करते थे। जहां शादी के 10 साल बाद उसके पति की मौत हो गई। और वह अपने एक 8 वर्ष के बच्चे के साथ अकेली पड़ गई। कुछ दिनों तक पड़ोसियों के घरों से मिलने वाले खाने को खाकर खुद और बच्चे का पेट भरा। लेकिन उसे महसूस हुआ कि वह खुद के साथ अपने बच्चे को भरपेट नहीं खिला पा रही है और ना ही बच्चे को शिक्षा देने की व्यवस्था कर रही है। इसके लिए वह अपने पति के कुली वाले कार्य पर वापस होने का निर्णय लिया। लेकिन सिर पर पल्लू रखकर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर आती जाती ट्रेनों के खिड़कियों की ओर झांकती, उसे लगता कि कोई उसे समान उठाने के लिए आवाज देगा। लेकिन इसमें भी उसे एकाध दिन शर्मिंदगी महसूस हुई। राजकुमारी सतनामी का पुत्र 9 वीं कक्षा में पढ़ रहा है। लेकिन वह चाहती है कि उसका बेटा पढ़ लिखकर बड़ा अधिकारी बने, ताकि उसे मेरी तरह बोझ नहीं उठाना पड़े। इसके लिए वह अधिक से अधिक मेहनत भी कर रही है।
   एक ओर जहां राजकुमारी सतनामी अनूपपुर रेलवे स्टेशन पर यात्रियों के बोझ होने को विवश हुई, वहीं 40वर्षीय फूलबाई कोल भी पति की मौत के बाद अपनी ही पति के कुली के काम करने खुद को तैयार किया। जहां कुली के काम मर्दो की बात सोचकर इस कार्य को करने से हिचकती रही, और पति के खो जाने के गम में स्टेशन पर उनकी याद में खूब रोती। जिसपर स्टेशन के बाबू, अधिकारी और अन्य कर्मचारी उसे ढाढस बंधाते। फिलहाल फुलबाई कोल खुद के साथ अपनी 19 वर्षीय पुत्री तथा 14 वर्षीय पुत्र के पालन पोषण कर रही है। फूलबाई कोल का कहना है कि जीवन के थेपेड़े मानव को जीना सीखा देते हैं, जो मैंने अपने पति को खोकर जाना है। मेरे पति रेलवे में पूर्व से कुली का काम करते थे, लेकिन अब उनकी अनुपस्थिति में मैं काम कर रही हूं। वह अनपढ़ है। लेकिन अनपढ़ महिलाओं द्वारा किए जा सकने वाले अन्य कामों में कुली जैसे कार्य करके वह खुश है। उसे अपनी मेहनत से अपना और अपने बच्चों का पेटभरने से सुकुन मिलता है।
   अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर विपरीत परिस्थितियों में रेलवे स्टेशन अनूपपुर में कुली का कार्य कर बच्चों की शिक्षा दीक्षा एवं परिवार का पालन पोषण करने वाली महिलाओं क्रमशः राज कुमारी एवं फूल बाई कोल को किया गया सम्मानित।
(65 days ago)
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