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सिंगरौली की लीलावर पहाड़ी, जिसमें संचालित था राजा का महल (खुशियो की दस्तां)
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सिंगरौली | 07-अप्रैल-2021
     जिला मुख्यालय वैढ़न से लगभग १५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित बिहारा गांव की लीलावर पहाड़ी अपने में इतिहास को संजोते हुये विचित्रता से परिपूर्ण लीलावर पहाड़ी का इतिहास स्थानीय जनमानस में आज भी कौतूहल का विषय है। बताते हैं कि इस पहाड़ी के अंदर कभी राजा का महल संचालित था। पहाड़ी एक अभेद दूर्ग के रूप में थी और राजा उसके अंदर निवास करते हुये अपनी प्रजा के क्रियाकलापों का संचालन करता था। 
बिहरा गांव सिंगरौली जिला मुख्यालय वैढ़न से तकरीबन १५ किलोमीटर दूर है लेकिन आज तक इस विचित्र पहाड़ी के बारे में जानने के लिए पुरातत्व विभाग ने कोई पहल नहीं की। यहां कई प्रकार की किवदंतियां प्रचलित हैं।
     एक किवदंती के अनुसार पहाड़ी में संचालित महल के राजा बालेन्दु जिन्हें लोग आज भी राजा बालेन्दी या राजा बालम नाम से पुकारते हैं। लीलावर पहाड़ी के मुख्य द्वार पर एक बीस फिट चौड़ा और बीस फीट लम्बा दरवाजा आज भी जीवंत है। इस दरवाजे पर दो पिलर पहले देखे गये थे। बताते हैं कि इस पिलर पर एक छत्र हुआ करता था जिसपर राजा बालेन्दु विराजमान होते थे। अपनी प्रजा को संचालित करते हुये एवं उनके दु:ख दर्द को यहीं बैठकर सुनते थे। पहाड़ी जहां से शुरू होती है उसकी सतह से लेकर इस मुख्य द्वार की ऊंचाई काफी है। मसलन कोई भी आदमी मुख्य द्वार तक आसानी से नहीं पहुंच सकता था। आज लीलावर पहाड़ी का यह मुख्य द्वार तथा लीलावर पहाड़ी बिना देखरेख के कारण काफी क्षतिग्रस्त हो चुकी है। फिर भी इमारत को देखकर उसकी बुलंदी का ऐहसास होता है।
    स्थानीय किसानों के अनुसार राजा बालेन्दु अपनी प्रजा को हल जोतने के लिए लोहे का फाल देते थे। एक सीजन हल जोतने के बाद किसान उनके फाल को वापस करता था। स्थानीय किसानों ने बताया कि राजा उस फाल पर पारस पत्थर का स्पर्श कराता था जिससे वह लोहा सोने का हो जाता था। राजा उस सोने के फाल को अपने पास रख लेता था और दूसरा लोहे का फाल उसको दे देता था। स्थानीय नागरिकों ने यह भी बताया कि राजा बलेन्दु के जाने के बाद लोग पहाड़ी के मुख्य द्वार पर जाकर कुछ मांगते थे वह उन्हें मिल जाता था। अपनी बेटी की शादी पर लोग अक्सर बर्तनों की मांग करते थे। बेटी की शादी का कार्ड वहां अर्पित किया जाता था और मांग मांगी जाती थी। फलस्वरूप दूसरे दिन सारे बर्तन मुख्य द्वार पर उपस्थित रहते थे। कालान्तर में कुछ लोगों ने बर्तन को वापस नहीं किया तथा बिना साफ किये बर्तन को वापस किया जिससे बर्तन प्राप्त करने की प्रक्रिया बंद हो गयी। उक्ताशय की जानकारी बिहरा गांव के वरिष्ठ नागरिक श्री राममणि शर्मा ने दी। बिहरा गांव के निवासी वरिष्ठ नागरिक ८५ वर्षीय मिलिट्री रिटायर्ड श्री राजीव लोचन सिंह बताते हैं कि राजा बालेन्दु का कार्यकाल कब का है यह कहा नहीं जा सकता क्योंकि रीवा रियासत तथा सिंगरौली रियासत के इतिहास में कहीं भी राजा बालेन्दु का जिक्र नहीं है।
 इसका मतलब है कि राजा बालेन्दु का इतिहास प्रागैतिहासिक है। 
   माड़ा की गुफाओं की तरह राजा बालेन्दु का कार्यकाल भी पाँचवी-छठवीं शदी का कहा जा सकता है। यह एक अनुमान है जिसपर पुरातत्व वेत्ताओं के जांच की अपेक्षा श्री सिंह करते हैं। एक किवदंती के अनुसार सिंगरौली आदिवासी क्षेत्र में खैरवार आदिवासी जाति का साम्राज्य था। किवदंती यह कहती है कि बाहर से आयी एक गर्भवती महारानी को खैरवारों ने प्रश्रय दिया उससे उत्पन्न प्रथम संतान ने सिंगरौली में वेणु वंश(बेलवंश) की स्थापना की जो कई पुस्तों तक सिंगरौली रियासत में शासक रहे। किवदंती के अनुसार इन्ही खैरवारों से राजा बालेन्दु का युद्ध हुआ जिसमें राजा बालेन्दु पराजित हुये और उन्हें लीलावर छोड़कर के मड़वास क्षेत्र की शरण लेनी पड़ी। एक किवदंती यह भी कहती है कि राजा बालेन्दु का चन्देल शासकों से युद्ध हुआ जिसमें उनकी पराजय हुयी। श्री राजीव लोचन बताते हैं कि चन्द वर्षों पहले लीलावर पहाड़ी के आस-पास बहुत से गड्ढे देखे गये थे जहां घोड़े की लीद मिली थी और लोगों ने यह आशय लगाया था कि यहां से राजा बालेन्दु द्वारा गाड़ा हुआ खजाना उनके वारिशों द्वारा खोजकर ले जाया गया था। लीलावर पहाड़ी तथा आस-पास का क्षेत्र पुरातत्व वेत्ताओं के लिए आकर्षण का केन्द्र बन सकता है क्योंकि आस-पास जो भी खुदाई हुयी है मतलब लोगों ने अपने घर मकान बनाने के लिए जो खुदाई की है उसमें देवियों की मूर्तियां, आंटा पीसने की पत्थर की चक्की, जांता, ताम्र के सिक्के, मिट्टी के बर्तन आदि प्राप्त हुये। बिहरा गांव के वरिष्ठ नागरिक तथा अधिवक्ता श्री अंजनी दुबे बताते हैं कि खुदाई से प्राप्त सामग्रियां बताती हैं कि प्रागैतिहासिक काल में यहां जीवन था, आबादी थी, लोग निवास करते थे जो कालान्तर में लुप्त हो गये।
    श्री राजीव लोचन सिंह से प्राप्त जानकारी के अनुसार राजा बालेन्दु के जमाने का एक तालाब आज भी लीलावर पहाड़ी के पास जीवंत है। जिससे ग्रामीणों को अनेक लाभ होते हैं। श्री सिंह बताते हैं कि रियासत चलाने तथा प्रजा को सारी सुविधाएं देने के लिए राजा बालेन्दु ने कोई कसर नहीं उठा रखी थी। श्री राजीव लोचन सिंह अधिवक्ता श्री अंजनी दुबे, बिहरा निवासी श्री शर्मा तथा अन्य से प्राप्त जानकारी तथा स्वयं के अवलोकन से जो तथ्य सामने आये हैं वह यह बताते हैं कि लीलावर पहाड़ी अपने में एक इतिहास है। जिसे पुरातत्व में शामिल करके जांच करने की जरूरत है। 

                                                                                                                       प्रस्तुतकर्ता
                                                                                                                       श्री आर.के श्रीवास्तव
                                                                                                                 संम्पादक काल चिंतन समाचार पंत्र
 





 
 
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