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मौत के मुंह से निकल आई दो युवा जिंदगियां (सफलता की कहानी)
एक पत्रकार और एक युवा अधिकारी ने साझा किए अनुभव
खरगौन | 16-अप्रैल-2021
      वर्तमान दौर किसी भी इंसान के लिए अच्छा नहीं है। हर एक जिंदगी कोरोना वायरस के डर से सहमी हुई है। शहर की दो ऐसी जिंदगियां जो मौत से लड़कर नया जीवन पाई है। बढ़ते संक्रमण के इस दौर में शहर के युवा पत्रकार आवेश परसाई जो पहले कोरोना वायरस के संक्रमण को मजाक समझते थे, लेकिन जब उनमें इंफेक्षन फैला, तो कोरोना की घातकता और उपचार की सार्थकता सामने आई। अन्नपूर्णा नगर सनावद रोड़ निवासी 35 वर्षीय आवेश परसाई बताते है कि 3 व 4 अप्रैल को हाथ-पैर व अकड़न की समस्या सामने आई, लेकिन ध्यान नहीं देने पर एक दिन बाद बुखार और खांसी शुरू हुई। इसके बाद 6 अप्रैल को खाना बंद और उल्टियां भी शुरू हो गई। इन सारे लक्षणों के बाद भी 7 अप्रैल तक अपने घर में ही रहें। 8 अप्रैल को आवेश ने सिटी स्केन और ब्लड की जांच कराई। रिपोर्ट में आवेश की सीआरपी 79 मिग्रा. प्रतिलीटर सामने आई, जो सामान्य व्यक्ति की सीआरपी से 69 मिग्रा. प्रतिलीटर अधिक अर्थात आवेश के शरीर में लगभ 70 प्रतिशत का संक्रमण फैल चुका था। लंग्स की हालत खराब हो गई। अस्पताल में डॉक्टरों द्वारा किया गया उपचार और सही समय पर रेम्डेसिविर इंजेक्षन लगने के बाद आज आवेश स्वस्थ्य होकर घर आ चुके है।
कृषि अधिकारी को भी डॉक्टरों ने दिया जीवनदान
   कृषि विभाग में सहायक संचालक के पद पर पदस्थ 40 वर्षीय राधेश्याम बड़ोले को 27 मार्च को हाथ-पैर व बदन में अकड़न की समस्या दिखाई देने लगी। जब घर पहुंचे, तो एयर कंडीशन और फिल्ड में धुप का कारण मानते रहें। उसी रात तेज बुखार आने के बाद घर पर ही एमबीबीएस डॉक्टर से गोली लेने पर बुखार में आराम हुआ, लेकिन अगले दिन फिर शरीर का तापमान बढ़ने लगा और सामान्य खांसी आने लगी। फिर से डॉक्टर द्वारा दिया गया डोज शुरू किया कुछ समय आराम मिलने के बाद तेज खांसी और बुखार हुआ। सहायक संचालक श्री बड़ोले ने दोस्तों से परामर्ष कर सीधे इंदौर रवाना हुए। बड़ोले की डॉक्टरों से पहचान होने के कारण 1 अप्रैल को निजी अस्पताल में भर्ती हुए। 3 व 4 अप्रैल को बड़ोले की अस्पताल में होने के बावजूद भी समस्या खांसी के रूप में होती रहीं। लंग्स रिपोर्ट में 5 प्रतिशत खराब होने के बाद दूसरी रिपोर्ट में 15 प्रतिशत तक लंग्स में संक्रमण फैल चुका था। हालात बहुत गंभीर होने के बाद इंजेक्षन और ऑक्सीजन लेने के बाद बड़ोले के स्वास्थ में 7 अप्रैल को सुधार हुआ और वे 9 अप्रैल को अस्पताल से डिस्चार्ज हुए।
मरीजों को हिम्मत और हौसलें से लेना होगा काम
     सहायक संचालक बड़ोले बताते है कि जो लोग बाहर घुम रहे है, वे रिस्क ले रहे है। जो घर पर है वे सुरक्षित है और जो अस्पताल में है, वो डॉक्टरों से उम्मीद लगाएं बैठे है। इस बीमारी का एक बहुत बड़ा इलाज मरीज के पास है और वह है हिम्मत। इस बीमारी में हिम्मत रखना बहुत जरूरी है। आवेश का कहना है कि जो कोरोना को मजाक समझ रहे है, वो अस्पताल जाकर एक नजर देख लें। मेरी माता राजमतीबाई भी संक्रमित हुई, लेकिन डॉक्टरों के इलाज और दोस्तों खासकर राजकुमार सोनी की मदद से स्वस्थ्य हुई है। दोनों ही युवाओं ने जिस तरह मौत से सामना किया। दोनों ही युवाओं का कहना है कि कोरोना बड़ा ही घातक है। जो लोग बिना वजह बाहर घुम रहे है, वे किसी भी समय कोरोना के शिकंजे में आ सकते है। यह दोनों ही युवा आज भी इस बात पर विचार कर रहे है कि उन्हें संक्रमण फैला कैसे? दोनों की अपील है कि बचकर रहेंगे, तो सुरक्षित रहेंगे। दोनों ही युवाओं ने इस संक्रमण में डॉक्टरों की भूमिका को नमन किया है।
 
(19 days ago)
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