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क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल जी की 124 वीं जयंती
ऑनलाइन परिचर्चा में किया योगदान को याद, सरफरोषी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...
बड़वानी | 11-जून-2021
प्राचार्य डॉ. एनएल गुप्ता  के मार्गदर्षन में वर्क फ्राम होम के अंतर्गत अवकाष की अवधि में भी ऑनलाइन सक्रिय शहीद भीमा नायक शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय बड़वानी के स्वामी विवेकानंद कॅरियर मार्गदर्षन प्रकोष्ठ द्वारा महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की 124 वीं जयंती के अवसर उनके योगदान को याद करते हुए उन्हें नमन किया। कार्यकर्ता प्रीति गुलवानिया ने रामप्रसाद बिस्मिल जी की प्रिय गजल सुनाते हुए कहा कि- सरफरोषी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है। वक्त आने दे तुझे बता देंगे ऐ आसमां, हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है। खींच कर लाई है हमको कत्ल होने की उम्मीद, आषिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है, ऐ शहीदे मुल्को-मिल्लत हम तेरे ऊपर निसार, अब तेरी हिम्मत का चर्चा गैर की महफिल में है। अब न अगले बल्वले हैं और न अरमानों की भीड़, सिर्फ मिट जाने की हसरत अब दिले बिस्मिल में है। यह भी बताया गया कि इसकी रचना रामप्रसाद बिस्मिल ने नहीं की, अपितु इसके रचयिता शायर बिस्मिल अज़ीमाबादी हैं।
कॅरियर काउंसलर डॉ. मधुसूदन चौबे ने बताया कि बिस्मिलजी का जन्म 11 जून, 1897 को हुआ था तथा 19 नवम्बर 1927 को वे शहीद हो गए। गुलामी के दौर में अंग्रेजों के विरुद्ध जिन क्रांतिकारियों ने जबर्दस्त भूमिका निभाई, उनमें रामप्रसाद बिस्मिल जी भी अग्रगण्य हैं। उन्होंने आजादी की लड़ाई में नया जोष उत्पन्न किया था। वे बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न थे। वे न केवल स्वतंत्रता सेनानी थे, अपितु साहित्यकार और अनुवादक भी थे। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी माताजी की सबसे बड़ी भूमिका थी। एक माँ ने उन्हें गढ़ा तो दूसरी माँ अर्थात् भारत माँ पर वे न्यौछावर हो गए। उनके क्रांतिकारी रणबांकुरों ने 9 अगस्त, 1925 को इन्होंने काकोरी काण्ड को अंजाम देकर ब्रिटिष सत्ता को बड़ी चुनौती दी। राजद्रोह, हत्या और हत्या सहित डकैती जैसे अपराधों का आरोप लगाकर रामप्रसाद बिस्मिल, रोषनसिंह ठाकुर और अषफाकउल्ला खान और राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को मृत्यु दण्ड दिया गया। आयोजन में सहयोग सलोनी शर्मा, जितेंद्र चौहान, अंकित काग, संजय चौहान ने दिया।
(11 days ago)
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