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बाघों का घर- सीधी (विश्व बाघ दिवस - 29 जुलाई)
लेखक श्री श्रेयस गोखले जिला पुरातत्व, पर्यटन एवं संस्कृति परिषद् सीधी के प्रभारी अधिकारी हैं
सीधी | 31-जुलाई-2021
     बाघ बघेलखंड की पहचान हैं। बघेलखंड से घनिष्ठ संबंध रखता हुआ बाघ बघेल वंश के संस्थापक महाराज श्री व्याघ्रदेव के नाम से लेकर तत्कालीन रीवां राज्य के राज्य प्रतीक एवं ध्येयवाक्य तक में अपनी दमदार उपस्थिति बनाए रखे हुए है। अपने शौर्य, निर्भयता, सजगता, भव्यता एवं अपराजेयता के कारण जाना जाने वाला बाघ बघेलखंड को भी अपने ये गुण देता हुआ सा प्रतीत होता है। रीवां राज्य का एक बहुत बड़ा भाग सघन वनों से भरा रहा है। इन वनों में बहुत बड़ी संख्या में बाघ रहा करते थे। क्षेत्र में सीधी जिला विशेष रूप से अपने बाघों व उनसे जुड़ी कहानियों के लिए प्रसिद्ध है।
     रीवां राज्य के महाराजाओं को प्राचीन समय में मृगया हेतु यह क्षेत्र बहुत प्रिय था। भंवरसेन, नौढि़या, बड़काडोल, पोंड़ी आदि अनेक क्षेत्रों में उनके द्वारा शिकारगाह स्थापित किए गये थे। बदलते समय के साथ वन्य प्राणियों के संरक्षण की महत्ता बढ़ती गई। स्वतंत्र भारत में तत्कालीन रीवा महाराजा श्री मार्तंड सिंह द्वारा सीधी क्षेत्र में सफेद बाघ होने की सूचना मिलने पर उसके संरक्षण व प्रजनन की दृष्टि से उसे सुरक्षित बाहर निकालने की व्यवस्था की गई एवं अपनी अभूतपर्व मनमोहकता के कारण उसका श्मोहनश् नामकरण किया गया। मोहन की संततियों से उत्पन्न सफेद बाघों से आज विश्व में अनेक स्थानों पर रीवा-सीधी क्षेत्र व मध्यप्रदेश का नाम गौरवान्वित हो रहा है। सीधी के पर्सिली रिसार्ट से सीधी सतना मार्ग पर लगभग 90 किमी की दूरी पर स्थित मुकुंदपुर व्हाइट टाइगर सफारी का राज्य अपना एक विशिष्ट स्थान है।
     सीधी के लोकजीवन में भी बाघों की उपस्थिति बड़े स्तर पर मिलती है। लोकगीतों, जनजातीय चित्रकला से लेकर गांवों के नाम तक बाघ से अछूते नहीं रहे हैं। चाहे वह सीधी की पश्चिमी सीमा पर रामपुर नैकिन तहसील में स्थित श्बघवारश् हो या पूर्वी सीमा पर सिहावल तहसील में स्थित श्बघोरश् हो, उत्तरी सीमा पर चुरहट तहसील में स्थित श्बघमरियाश् हो, जिले के मध्य में स्थित श्बघवारीश् हो, या फिर यत्र तत्र बसे बघैला, बघऊ, बघमरा, बघेड़ा, बाघड़, बघौड़ी आदि गांव हों, बाघ सीधी के जनमानस में प्राचीन काल से रचा बसा रहा है। सीधी का दक्षिणी भाग- कुसमी तहसील तो आज के समय में बाघों के संरक्षण का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र बनकर उभरा है।
     सीधी-सिंगरौली व छत्तीसगढ़ में लगभग 466 वर्ग किलोमीटर में फैला संजय टाइगर रिजर्व बाधंवगढ़ व झारखंड के पलामू के मध्य बाघों के आवागमन हेतु एक कॉरीडोर के रूप में स्थित है। 2018 की बाघ गणना के अनुसार वर्तमान में संजय टाइगर रिजर्व क्षेत्र में 6 बाघ विचरण करते हैं। कुसमी क्षेत्र के वनभागों में बड़ी सहजता से बाघ के पदचिह्न अनायास ही देखने मिल जाते हैं। आमजनों विशेषकर युवाओं को बाघ संरक्षण व प्रकृति के विभिन्न अवयवों से परिचित कराने की दृष्टि से संजय टाइगर रिजर्व क्षेत्र में टाइगर सफारी भी शासन द्वारा प्रारंभ की गई है। यह वर्तमान में इको-पर्यटन की दृष्टि से एक बहुत महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया है। यहां पर्यटकों को ग्रामीण व वन्य परिवेश का अनुभव देने के लिए ग्राम खोखरा एवं ठाड़ीपाथर में मध्यप्रदेश पर्यटन बोर्ड के सौजन्य से रुरल होम स्टे स्थापित किए गये हैं।
     बाघ की विशेषता है कि अपने होने भर से वह पूरी प्रकृति को समृद्ध बनाने लगता है। जहां बाघ व उसके परिवार फलते फूलते हैं वहां का पर्यावरणीय संतुलन बनने लगता है व वनस्पति व जीवों की जैव विविधता स्वाभाविक रूप से प्रकट होती हुई दिखाई पड़ने लगती है जिसके फलस्वरूप वनों की स्थिति सुधरती है। सीधी जिले का बाघ संरक्षण में योगदान महत्त्वपूर्ण है। बाघों के इस घर सीधी को बाघों के लिए सुरक्षित व संवहनीय बनाए रखने के लिए हमें हरसंभव प्रयास करने का संकल्प लेने की आवश्यकता है।   

 
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