समाचार
|| जिले में 131 बच्चे शिशुगृहों में निवासरत || ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट के दिखने लगे परिणाम || लोक अदालत में मिलेगा सबको सस्ता-शीघ्र-सुलभ न्याय || जिला प्रशासन आगामी 29 जून को विधवा, तलाकशुदा को दिलायेगा प्रायवेट नौकरी || आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं व सहायिकाओं को 330 रूपये वार्षिक किस्त देने पर मिलेगा 2 लाख रूपये बीमा का लाभ || अजा/जजा वर्ग के 08 अभ्यर्थी प्रशासनिक सेवा में चयनित || बांधवगढ़ की अनुशंसा पर इलाज हेतु पांच हजार की प्रशासकीय स्वीकृति || विधायक बांधवगढ़ की अनुशंसा पर टैंकर प्रदाय हेतु आठ लाख उन्यासी हजार एक सौ अठानवें रूपये स्वीकृत || स्कूलों के विद्यार्थियों की दक्षता आंकलन के लिये बेसलाइन टेस्ट 25 जून से || सुपर-100 चयन परीक्षा एक जुलाई को
अन्य ख़बरें
सम्राट विक्रमादित्य की तरह ही महान, विद्वान, यशस्वी और परोपकारी थे उनके नवरत्न "विक्रमोत्सव"
विक्रमादित्य के दिवंगत हो जाने के बाद भी जीवित थे उनके नवरत्न, वर्तमान समय में भी प्रासंगिक है विक्रमादित्य के नवरत्न, विक्रमादित्य के नवरत्नों पर परिचर्चा आयोजित
उज्जैन | 14-मार्च-2018
 
    
   विक्रमोत्सव के तीसरे दिन बुधवार की शाम को हरसिद्धि मंदिर के पास स्थित विक्रमादित्य के टीले पर प्रेमचंद सृजन पीठ, प्राचीन भारतीय इतिहास विभाग तथा सिंधिया प्राच्य शोध संस्थान और विक्रमादित्य शोधपीठ के संयुक्त तत्वावधान में सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों पर परिचर्चा आयोजित की गई। परिचर्चा में मुख्य अतिथि संयुक्त आयुक्त श्री प्रतीक सोनवलकर थे। विशिष्ट अतिथि के तौर पर कालिदास संस्कृत अकादमी की निदेशक श्रीमती प्रतिभा दुबे थीं।
   परिचर्चा के संयोजक प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक डॉ जीवन सिंह ठाकुर थे। उनके द्वारा अतिथियों का सम्मान कर स्वागत भाषण दिया गया।सिंधिया प्राच्य विद्या शोध संस्थान के निदेशक प्रोफेसर बालकृष्ण शर्मा ने विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक महाकवि कालिदास के चरित्र एवं जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ये नवरत्न ही सम्राट विक्रमादित्य के महिमामंडन को और परिष्कृत करते हैं।सम्राट विक्रमादित्य के समान ही उनके नवरत्न महान, विद्वान और परोपकारी रहे हैं।
   महाकवि कालिदास उनके नवरत्नों में सर्वाधिक प्रसिद्ध रहे हैं। कालिदास की रचनाओं में प्रमुख रघुवंशनाथम में महाकाल मंदिर का बहुत सुंदर वर्णन किया गया है। संस्कृत साहित्य में रामायण और महाभारत के बाद लोक साहित्य में कालिदास द्वारा रचित ग्रंथों को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। कालिदास की तुलना में आज भी कोई कवि स्थान नहीं बना सका है। संस्कृत साहित्य में दृश्य और श्रवण काव्य प्रमुख रहे हैं। महाकवि कालिदास के अनुसार उनकी रचनाओं को केवल संत और सज्जन पुरुष ही भली भांति समझ सकते हैं। उनकी रचनाओं में वक्रोक्ति भी प्रमुख रुप से निहित रहती थी। कालिदास ने ही नवीन काव्य विधा "दूत काव्य विधा"  की परंपरा का शुभारंभ किया। रितुओं के स्वतंत्र रूप से वर्णन करने की विधा भी उन्होंने अपनी काव्य रचनाओं में की।सम्राट विक्रमादित्य के सदैव सानिध्य में रहकर ही कालिदास महाकवि बन सके। क्योंकि उन्होंने एक जौहरी की भांति उन्हें परखा।
   डॉ. श्याम नारायण व्यास ने विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक बेताल भट्ट पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि बेताल भट्ट कुछ परा - शक्तियों के ज्ञाता थे। उन्हें कुछ दिव्य शक्तियों की सिद्धि प्राप्त थी। बेताल पच्चीसी की कथाएं इनके द्वारा ही रचित की गईं। उन्होंने सम्राट विक्रमादित्य की न्यायप्रियता, धर्म और सदाचार को आमजन में कथाओं के माध्यम से प्रचारित किया। उन्होंने कहा कि सम्राट विक्रमादित्य जैसे श्रेष्ठ मनुष्य की परोपकार के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करते हैं। कुछ रचनाओं में भाग्य की प्रबलता पर भी बेताल भट्ट ने जोर दिया और उसे ही सर्वोपरि माना। आम जनता को भी बेताल भट्ट ने कई उपदेश दिए। उन्होंने अपनी रचनाओं में राजा की मर्यादा, नीति और शौर्य का वर्णन किया।
   डॉ. केदारनाथ शुक्ल ने नवरत्न  में से एक अमर सिंह के बारे में परिचर्चा में कहा कि उन्होंने अमरकोश नामक ग्रंथ की रचना की थी। सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्न संपूर्णता को परिलक्षित करते हैं। अमरकोश की रचना अमर सिंह द्वारा इसी उद्देश्य से की गई थी। इसमें शब्दों का अमर संग्रह है। यह एक तरह का संकल्प कोश है। समस्त विषयों को एक ही स्थान पर लाने का कार्य अमर सिंह द्वारा किया गया। आज भी पठन पाठन में अमर कोश जीवित है। विक्रमादित्य के नवरत्नों को सनातन माना गया है। वे आज भी हमारे लिए प्रासंगिक है।
   प्रोफेसर शरद शर्मा ने कहा कि वर्तमान में इतिहास के पुनर्लेखन और पुनर्जीवन की आवश्यकता है। सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्न वृहद स्तर पर चिंतन करने वाले विद्वान थे। इनके नवरत्नों को यदि व्यापक परिदृश्य में देखा जाए तो उनके कई आयाम दिखाई देते हैं। नवरत्नों का संबंध देश के सुदूर क्षेत्रों से भी रहा है। वररुचि विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे तथा उनके समकालीन भी थे। कुछ परंपराओं में वररुचि को सम्राट विक्रमादित्य का भ्राता भी माना गया है। इनका विस्तार दक्षिण भारत तक देखा गया है। वैज्ञानिक व्यांडी भी विक्रमादित्य के समकालीन थे। उन्होंने मनुष्य के हवा में उड़ने की तकनीक इजाद की थी।
   प्रोफेसर आर सी ठाकुर ने नवरत्नों में से एक धनवंतरी पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि महिदपुर से कुछ दूरी पर धनवंतरी महादेव का मंदिर है। वहां की पहाड़ियों में कई तरह की विशिष्ट जड़ी बूटियां मिलती हैं, हो सकता है कि धनवंतरी का जन्म स्थान और कार्यस्थल भी वहीं पर हो। धनवंतरी की चिकित्सा पद्धति आज भी प्रयोग में लाई जाती है। वे आयुर्वेद के प्रथम प्रणेता थे।
   डॉ प्रियंका चौबे ने कहा कि विक्रमादित्य के नवरत्नों ने आज भी हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति को प्रवाहमान बनाए रखने का कार्य किया है। आचार्य  वराह मिहिर विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे। वे वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य थे, नक्षत्र ज्ञानी थे। उनके पिता आदित्य दास थे। उज्जैन नगरी उनकी जन्म स्थली शिक्षा स्थली और कर्म स्थली रही है। आचार्य वराह मिहिर ने खगोलीय कार्यशाला का प्रमुख केंद्र उज्जैन को बनाया था।
   कार्यक्रम के मुख्य अतिथि संयुक्त आयुक्त श्री प्रतीक सोनवलकर ने कहा की सम्राट विक्रमादित्य के बारे में हम बचपन से कई कहानियां सुनते आ रहे हैं।वे एक न्याय प्रिय शासक थे। प्रशासन से जुड़े होने के कारण हमें सम्राट विक्रमादित्य से काफी कुछ सीखना चाहिए। उनके नवरत्नों की विशेषताओं और गुणों का व्यापक प्रचार प्रसार किया जाना चाहिए। नवरत्नों पर आधारित परिचर्चाओं में आम जन की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाना चाहिए। विशेष रूप से युवा पीढ़ी को सम्राट विक्रमादित्य के शौर्य और उनके नवरत्नों की गौरवगाथा के बारे में बताया जाना आवश्यक है।इसे प्रादेशिक स्तर और राष्ट्रीय स्तर पर भी आयोजित किया जाना चाहिए तभी इसका महत्व और बढ़ सकेगा।
   डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि सम्राट विक्रमादित्य और उनके नवरत्नों की चर्चा 12 वीं शताब्दी से लगातार की जाती रही है। महाकवि कालिदास द्वारा 34 ईसापूर्व में एक पुस्तक लिखी गई थी। जिसमें उन्होंने सभी नवरत्नों के बारे में वर्णन करते हुए यह लिखा है कि जैसे तालाब के सूखने से हंस निराश हो जाता है, वैसे ही विक्रमादित्य के जाने के बाद उनके सभी नवरत्न निराश हो गए हैं। अर्थात विक्रमादित्य के दिवंगत हो जाने के पश्चात भी उनके नवरत्नों जीवित थे। डॉ राजपुरोहित ने कहा कि सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों में वे रत्न जो थोड़े कम प्रसिद्ध थे, उन्हें व्यापक स्तर पर चर्चा में लाए जाने की आवश्यकता है, तभी आमजन सभी नौ रत्नों से अच्छे से परिचित हो सकेंगे। जैसे शपणक, घटकरपर और शंकु के बारे में भी आम जनता में व्यापक प्रचार-प्रसार किए जाने की आवश्यकता है।
   कार्यक्रम का संचालन डॉ निशा केवलिया शर्मा ने किया और आभार प्रदर्शन डॉक्टर जीवन सिंह ठाकुर ने किया।
(100 days ago)
डाउनलोड करे क्रुतीदेव फोन्ट में.
डाउनलोड करे चाणक्य फोन्ट में.
पाठकों की पसंद

संग्रह
मईजून 2018जुलाई
सोम.मंगल.बुध.गुरु.शुक्र.शनि.रवि.
28293031123
45678910
11121314151617
18192021222324
2526272829301
2345678

© 2012 सर्वाधिकार सुरक्षित जनसम्पर्क विभाग भोपाल, मध्यप्रदेश             Best viewed in IE 7.0 and above with monitor resolution 1024x768.
Onder's Computer