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अपनी जिम्‍मेदारी से बचता और बाल विवाह में हल ढूंढता समाज
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गुना | 17-अप्रैल-2018
 
   दुनिया में जब विकास के कई चरण पूर्ण हो चुके हों और हमारे समाज में आज भी ऐसा वर्ग मौजूद हो, जो कहीं बच्‍चों के कदम न बहक जाएं, इस सोच में या पोते-पोतियों का मुख देखने की चाह में कच्‍ची उम्र में ही बच्‍चों के विवाह की कुप्रथा को जीवित रखे हों, तो ऐसी मानसिकता को अपनी मूलभूत जिम्‍मेदारी से बचने से अधिक कुछ और नहीं कहा जा सकता है। जो उम्र बच्‍चों के शरीर के विकास और पोषण तथा संस्‍कार की हो, उस उम्र में उनका विवाह करना, उन्‍हें अंधेरे मोड़ पर छोड़ देने जैसा ही है।
   हमारे समाज के बहुत से वर्गों में लड़के-लड़कियों के विवाह काफी छोटी उम्र में कर दिए जाते हैं। वे एक छलांग-सी लगाकर दाम्‍पत्‍य जीवन के घेरे में एकाएक कूद पड़ते हैं, जबकि मानसिक और शारीरिक दोनों ही दृष्टियों से वे दाम्‍पत्‍य जैसे गंभीर और महत्‍वपूर्ण व्‍यापार के अयोग्‍य होते हैं। अभिभावक लोग प्राय: इस‍लिए जल्‍दी शादी करने के पक्ष में रहते हैं कि एक तो वे शादी की जिम्‍मेदारी से जल्‍दी  बरी हो जाएं और दूसरे वे अपने पोते-पोतियों का मुख देख सकें और लड़के वाले भी अपने बुढ़ापे में सहारा पाने के लिए जल्‍दी संतान उत्‍पन्‍न कर सकें। आजकल तो यह सोच ज्‍यादा काम कर रही है कि कहीं बच्‍चों के कदम न बहक जाएं तथा कुछ वर्ग बे‍टियों की आबरू की फिक्र में डूबे रहते हैं। लेकिन जिन्‍दगी छोटे-छोटे रास्‍तों को पकड़कर जल्‍दी-जल्‍दी पार करने की मंजिल नहीं है। जीवन छोटे रास्‍तों में विकास नहीं पाता।
   जिन जातियों में अल्‍पायु में ही विवाह करने की प्रथा है, उनमें लोग अल्‍पायु ही होते हैं। ऐसे व्‍यक्ति जल्‍दी ही जवानी पार करके प्रौढ़ हो जाते हैं और फिर जल्‍दी ही बूढ़े़ होकर मर जाते हैं। आधुनिक विज्ञान के मत से स्‍त्री अठारह वर्ष की आयु के पश्‍चात ही शारीरिक रूप से गर्भधारण योग्‍य होती है। शरीर विज्ञान हमें बताता है कि पच्‍चीस वर्ष की आयु तक शरीर का निर्माण कार्य पूरा हो पाता है। माता के गर्भ से लेकर पच्‍चीस वर्ष की  युवावस्था तक निरंतर हमारे शरीर की हड्डियां, स्‍नायु, पेशियां तथा अन्‍य धातुएं क्रमश: बनती रहती हैं। अत: जीवन निर्माण की दृष्टि से पच्‍चीस वर्ष तक का समय अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण है। जीवन पूर्ण रूप से विकसित हो सके,इसके ‍लिए जरूरी है कि बाल्‍यावस्‍था में ही उसे विकास परिस्थितियां मिलें। बाल्‍यकाल जीवन का एक महत्‍वपूर्ण भाग है, जिनका विकास खेल-कूद और मनोरंजन से अधिक होता है। शरीर निर्माण की दृष्टि से बारह वर्ष की आयु से तेई-चौबीस वर्ष तक का काल अत्‍यन्‍त गंभीर और महत्‍व का होता है। बारह-तेरह वर्ष की आयु से किशोर वय शुरू हो जाती है।
   शरीर की नलिका-विहीन ग्रंथियां अपना काम शुरू कर देती हैं। शरीर में इनका कार्य बड़ा अद्भुत और महत्‍वपूर्ण होता है। इन ग्रंथियों से निकलने वाले स्राव ‘’हारमोन्‍स’ कहलाते हैं। इन ग्रंथियों में कोई नलिका नहीं होती और इन के स्राव किसी नलिका द्वारा नहीं बहते, इसलिए इन्‍हें नलिका विहीन ग्रंथियां कहा जाता है। इनसे निकलने वाले ‘’हारमोन्‍स’’ ग्रंथियों से चूकर सीधे रक्‍त स्राव में मिल जाते हैं। इन से निकलने वाले ‘’हारमोन्‍स’’ शरीर की हड्डियों, स्‍नायुओं, पेशियों तथा दूसरी धातुओं को यौवन का पोषण पंहुचाते हैं। हड्डियों की मजबूती, स्‍नायुमण्‍डल की सशक्‍ता, पेशियों की क्रियाशीलता एवं हृदय, जिगर, फेफड़े और मस्तिष्‍क जैसे महत्‍वपूर्ण अंगों के स्‍वस्‍थ संचालन में इन हारमोन्‍स का एक बड़ा भाग होता है।
   दुर्भाग्‍यवश जिन लड़के-लड़कियों का इस काल में ही विवाह हो जाता है और वे यौनाचार प्रारंभ कर देते हैं या किसी यौन रोग का शिकार हो जाते हैं, उनकी स्थिति एक प्रकार से आगे चलकर बड़ी ही दयनीय हो जाती है। हो सकता है कि उन्‍हें इस समय अपने शरीर में कोई त्रुटि न मालूम पड़े और शरीर की वृद्धि यथाक्रम होती रहे, वे फिलहाल शक्ति का ह्रास भी अनुभव न करें। लेकिन भीतर ही भीतर शरीर का संतुलन बिगड़ना प्रारंभ हो जाता है।
   कैसी विडंबना है कि जो उम्र शरीर के पोषण और विकास के लिए होती है, उस उम्र में बाल विवाह हो जाते हैं। बाल विवाह की प्रथा भारत में अभी तक चली आ रही है। यद्यपि शिक्षित समाज में इसकी संख्‍या कम हो रही है, परंतु गांवों और कस्‍बों में यह अभी भी उसी प्रकार बनी हुई है। बाल विवाह एक कुप्रथा है, जिसका परिणाम वर-वधु के स्‍वास्‍थ्‍य पर अच्‍छा नहीं पड़ता। सन्‍तान जो होती है, वह भी कमजोर। उन्‍हें वैवाहिक जीवन का कोई ज्ञान नहीं होता और नाहीं वे अपना उत्‍तरदायित्‍व समझ सकते हैं। इनमें बेमेल विवाह भी हो जाते हैं। सबसे बुरी स्थिति लड़कियों की होती है। एक तो वे शिक्षा से वंचित हो जाती हैं। पहली संतान के बाद से ही उनके शरीर को रोग घेरने लगते हैं। यदि संतानों का क्रम बढ़ा, तो ‍स्थित और खराब हो जाती है।
   बाल विवाह का एक गंभीर कारण माता-पिता में कहीं बच्‍चे बहक न जाएं जैसी सोच को लेकर भी है। यह मां-बाप का दायित्‍व है कि वे बच्‍चों को ऐसे दुर्व्‍यसनों से दूर रखें। उनका ध्‍यान किसी स्‍वस्‍थ, रचनात्‍मक कार्य की ओर लगाया जाए, जिससे उनके मस्तिष्‍क का विकास हो तथा उससे उन्‍हें आनंद की प्राप्ति भी हो सके। बच्‍चों में अधिकतर कुटेव कुसंगति के कारण ही आते हैं। बच्‍चों को कुसंगति से बचाना चाहिए। उन्‍हें गंदी व भद्दी किताबों और बुरी फिल्‍मों से भी बचाना चाहिए। इसके अतिरिक्‍त बच्‍चों को संयम की शिक्षा भी दी जानी चा‍हिए। प्राचीन काल में ब्रम्‍हाचर्य  का पालन एक प्रकार से गृहस्‍थ जीवन की तैयारी समझा जाता था। उनमें अनुशासन की भावना उत्‍पन्‍न होती थी तथा वे अपने उत्‍तरदायित्‍व को समझने लगते थे। परंतु दुर्भाग्‍यवश इस ओर आजकल कोई ध्‍यान नहीं दिया जाता। अच्‍छी संगति से बच्‍चों का चरित्र अच्‍छा बनता है और बुरी संगति से बुरा।
   बच्‍चों में कुछ संस्‍कार तो जन्‍मजात होते हैं, जो उन्‍हें अपने माता पिता से प्राप्‍त होते हैं और कुछ संस्‍कार उन्‍हें बाहरी दुनिया से प्राप्‍त होते हैं। बच्‍चों में अच्‍छे संस्‍कार का होना उनकी शिक्षा-दीक्षा पर निर्भर है। जिस प्रकार की उनकी शिक्षा-दीक्षा होगी, उसी प्रकार उनके संस्‍कार भी बनेंगे। इसी प्रकार अच्‍छी-बुरी संगति का भी उनके चरित्र पर काफी प्रभाव पड़ता है। य‍दि बच्‍चों में संस्‍कार अच्‍छे हैं, तो उन पर संशय की कोई वजह नहीं बनती। शरीर की रक्षा करना सबसे पहला धर्म है। रोगी, बलहीन और घिसट-घिसट कर जीने वाले अस्‍वस्‍थ नर-नारी लौकिक और परालौकिक सुख से वंचित रहते हैं। रोग किसी न किसी प्राकृतिक नियम का उल्‍लंघन करने का परिणाम होता है। बाल विवाह प्राकृतिक नियम का ही उल्‍लंघन है।
(91 days ago)
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