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शहीद बिरसा मुंडा ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए: अध्यक्ष ज्योतिप्रकाश धुर्वे
बिरसा मुंडा जयंती का कार्यक्रम कलेक्ट्रेड आडोटोरियम में सम्पन्न हुआ
डिंडोरी | 15-नवम्बर-2020
शहीद जननायक बिरसा मुंडा ने अंग्रेज सरकार के अत्याचारों का कडा विरोध किया और जल जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए। जननायक बिरसा मुंडा भारत माता के सच्चे सपूत है, पूरा देश उनके बलिदान को हमेशा स्मरण करेगा। जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती ज्योति प्रकाष धुर्वे ने रविवार को कलेक्ट्रेड आडोटोरियम में आयोजित बिरसा मुंडा की जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर उक्त कथन व्यक्त किए। इस अवसर पर कलेक्टर श्री बी. कर्तिकेयन, पुलिस अधीक्षक श्री संजय सिंह, जिला पंचायत के मुख्यकार्यपालन अधिकारी श्री अरूण कुमार विष्वकर्मा. एसडीएम डिंडौरी महेष मंडलोई, सहायक आयुक्त आदिवासी विकास डॉ. अमर सिंह उइके, जिला खादय एवं आपूर्ति अधिकारी श्री आर.एम. सिंह संहित जिला एवं जनपद स्तरीय अधिकारी-कर्मचारी मौजूद थे। जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती धुर्वे ने कहा कि मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने शहीद जननायक बिरसा मुंडा की वीरगाथाओं को जन-जन तक पहुचाने के लिए उनके जन्म दिवस को पूरे प्रदेश में मनाने का संकल्प लिया है। जिससे आने वाली पीढियॉ बिरसा मुंडा की वीरगाथाओं को याद रख सके। उन्होंने कहा कि भारत के आजादी की लडाई में देश के कोने-कोने से आदिवासियों ने अंग्रेज सरकार से कडा संघर्ष किया और अपने प्राण न्यौछावर किए है। भारत की आजादी की लडाई में आदिवासियों का संघर्ष महत्वपूर्ण रहा है। 
        आयोजित कार्यक्रम में बताया गया कि कार्यक्रम में बताया गया कि सिंहभूमि प्राचीन बिहार का वह भूभाग है जो वर्तमान में झारखंड के नाम से जाना जाता है, यहां की प्रमुख नगरी रांची 19 वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में बिरसा विद्रोह की साक्षी रही है। बिरसा उस महानायक का नाम है जिसने मुंडा जनजाति के विद्रोह का नेतृत्व किया था। एक इष्ट के रूप में पूजित बिरसा मुण्डा पूरे मुण्डा समाज के साथ-साथ देश के आदिवासी समाज की अस्मिता बन गये। बिरसा ने पूरे जंगलों की प्राणवायु को संघर्ष की ऊर्जा से भर, सबके जीवन का आघार बना दिया था । 15 नवम्बर, 1875 को जन्मे बिरसा मुण्डा के पिता सुघना मुण्डा तथा माता करनी मुण्डा खेतिहर मजदूर थे। बिरसा बचपन से ही बड़े प्रतिभाशाली थे। कुशाग्र बुद्धि के बिरसा का आरंभिक जीवन जंगलों में व्यतीत हुआ। उनकी योग्यता देख उनके शिक्षक ने बिरसा को जर्मन मिशनरी स्कूल में भर्ती करवा दिया। इसकी कीमत उन्हें धर्म परिवर्तन कर चुकानी पड़ी। यहां से मोहभंग होने के बाद बिरसा पढ़ाई छोड़ चाईबासा आ गये। देश में स्वाधीनता की आवाज तेज होने लगी थी । बिरसा पुन: अपने आदिवासी धार्मिक परंपरा में वापिस लौट आये। अंग्रेजों ने अपनी कुटिल नीतियों के द्वारा पहले जंगलों का स्वामित्व आदिवासियों से छीना, फिर बड़े जमीदारों ने वनवासियों की जमीन हड़पना शुरु की। इस अन्याय के विरुद्ध बिरसा मुण्डा ने ब्रिटिशों, क्रिश्चियन मिश्नरियों, भूपतियों एवं महाजनों के शोषण व अत्याचारों के खिलाफ छोटा नागपुर क्षेत्र में मुण्डा आदिवासियों के विद्रोह (1899-1900) का नेतृत्व किया। 3 मार्च, 1900 को अंग्रेजों ने बिरसा को गिरफ्तार कर रांची जेल में बंद कर दिया। जेल में शारीरिक प्रताड़ना झेलते हुए 9 जून, 1900 को बिरसा वीरगति को प्राप्त हो गये।
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