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उज्ज्वला ने बदली तकदीर - ‘‘सफलता की कहानी’’
उर्मिला को लकडि़यों एवं कंडों के धुएं से मिली मुक्ति
अनुपपुर | 04-अप्रैल-2021
मजदूर परिवार से नाता रखने वाली पचास वर्षीया उर्मिला सिंह आज उन दिनों को भूल चुकी हैं, जब वह मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाया करती थीं। रसोई के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ईंधन के रूप में लड़कियों एवं गोबर के उपले से निकलने वाला धुआं उनके फेंफड़ों के लिए खतरे की घंटी बना हुआ था। लेकिन अब उनके लिए जिंदगी बदल चुकी है।
    जिले की परसवार ग्राम पंचायत के खोलीटोला की रहने वाली उर्मिला ने जिंदगी भर मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाया। पर आज वह उज्ज्वला योजना के तहत मिले गैस सिलेंडर पर खाना बना रही हैं। उर्मिला को वर्ष 2018 में ‘‘उज्ज्वला’’ योजना के तहत मिले गैस सिलेंडर से उनके चेहरे पर आज भी खुषी देखी जा सकती है। पहले खाना बनाने में जो अधिक समय लगता था, गैस सिलेंडर आ जाने के बाद से उसमें बहुत कमी आ गई है।
    खाना बनाने के लिए लकडि़यों एवं कंडों से निकला धुआं उर्मिला की सेहत के लिए हानिकारक बना हुआ था। ऊपर से बर्तन अलग से काले हो जाते थे। बर्तनों को घिस-घिसकर साफ करना पड़ता था। खाना बनाने में ज्यादा वक्त लगने के कारण कई बार तो बच्चे बगैर नाष्ता किए ही पढ़ने चले जाया करते थे। लकडि़यां जलाने में मिट्टी के तेल का भी इस्तेमाल करना पड़ता था। बरसात में लकडि़यों एवं उपलों में सीलन आ जाने के कारण खाना बनाने में और अधिक वक्त लग जाया करता था।
    उर्मिला का बेटा जित्तू सिंह कहता है कि घर में गैस कनेक्शन आ जाने से मां बहुत ही खुष हो गई थी और यह खुशी आज तक बरकरार बनी हुई है। जित्तू सिंह कहता है कि चूल्हे के अलावा हमारे पास विकल्प ही क्या था। धुएं की वजह से मां को कफ की समस्या आ जाती थी। घर में पैसे ना होने के कारण गैस सिलेंडर नहीं खरीद पा रहे थे। लेकिन प्रधानमंत्री जी ने उनकी मां को इस समस्या से निजात दिला दी। उर्मिला बताती हैं कि पहले जंगल से लकडि़यां एवं कंडे बीन कर लाते थे। पहले खाना बनाने में बहुत ज्यादा समय लगता था, लेकिन अब आधा घंटे में खाना बनकर तैयार हो जाता है। अब बर्तन भी काले नहीं होते और बरसात में झट खाना तैयार हो जाता है। जिले में बड़ी संख्या में लोगों को उज्ज्वला गैस सिलेंडर दिए गए हैं। 
(42 days ago)
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