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पशु पालन दुग्ध व्यवसाय ने बनाया मजदूर से मालिक "खुशियों की दास्तां"
बीड़ी मजदूरी छोड़ अब करतीं हैं भैंस पालन
सागर | 16-सितम्बर-2021
   कुछ करने की चाह और मजबूत इरादे हों तो अशिक्षा, अभाव या संसाधनों की कमी आढे़ नहीं आती है। ग्राम आमेट की श्रीमती द्रोप्ति देवी ने महिलाओं के साथ समूह से जुड़ने क बाद खुद को रॉल मॉडल के रूप में पेश किया है।
   गोद में धरे तेंदू के पत्ते और तम्बाखू के ढेर सूपे में बीड़ी की पूंग्गियों को तम्बाखूओं से भरकर छुल्ली से मोते हुए दूर क्षितिज तक पथराई आंखें केवल अंधकार ही देख पाती थीं। अपने दोनों बच्चों के सुन्हरे भविष्य का सपना संजायें द्रोपती साइकिल की घंटी सुनकर अचानक चौक जाती हैं। जानती है कि उसके पति बेलदारी करके अब लौट आये हैं। सूपे को किनारे धरकर पति को पानी लेने जाती है। ग्राम आमेट विकासखण्ड सागर की श्रीमती द्रोपती देवी अपने परिवार में पति के अलावा दो बेटों के लालन-पालन में जुटी हुईं थीं। लगभग 1.25 एकड़ खेत के टुकड़े को लाख जोतने बौने के बावजूद भी घर चलाने लायक पैदावार उन्हें कभी नहीं मिली। उनके पति श्री कलू काम की तलाश में अपनी साइकिल से रोज शहर चले जाते जहां उन्हें बेलदारी का काम मिलता और शाम 150 से 200 रूपये लेकर लौटते द्रोपती भी अपने घर के काम काज निपटाकर बीड़ी बनाना शुरू कर देती। उसके पति को जिस दिन काम नहीं मिलता तो वे भी घर आकर द्रोपती के साथ बीड़ी बनाते कुल मिलाकर परिवार को चलाने के लिए ढाई- तीन हजार रूप्ये जुट पाते। कभी दवाई का खर्चा, तो कभी साइकिल पंचर, तो कभी राशन खत्म या फिर गरजते बादलों से छत टपकना शुरू हो जाती। घर के खर्चों की लिस्ट कभी कम न हो पाती और आमदनी है कि बढ़ने का नाम भी नहीं लेती थी। जिंदगी तूने मुझे कब्र से कम दी है जमीं, पैर फैलाऊं तो दीवार से सर लगता है। अपने अंधयारे जीवन में निराशा के सिवा द्रोपती के पास कुछ नहीं था।
   दिसम्बर 2016 में आजीविका मिशन के कर्मचारियों की गांव में आवाजाही शुरू हुई उसे पता लगा कि गरीब परिवारों का सर्वे हुआ है और गांव में सबकी बैठक बुलाई गई है। बैठक में जाने से पता लगा कि महिलाओं को अपने समूह बनाना है। बस यही सूचना इसी जानकारी में उसके जीवन में एक जिंगारी भर दी। 13 महिलाओं को जोड़कर एक समूह बनाया गया। नाम रखा गया- लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह। यद्यपि इस नाम के चयन का भी लॉजिक था कि सबको लक्ष्मी की जरूरत थी। सबको धन चाहिए था वे गरीबी के घोर अंधेरे से बाहर आकर लक्ष्मी के सहारे उजयाले की ओर कदम रखना चाहती थीं। 30 रूप्ये प्रति सप्ताह के इस बचत समूह को खाता खोलने के कुछ माहों के बाद ही रिवॉल्विंग फंड के रूप में 1300 हजार रूप्या मिला जो आपसी जरूरत की पूर्ति में रिवॉल्व हो गया।
अवसर को पहचाना :-
 शहर में बेलदारी का काम करते उसके पति को ये अंदाजा हो गया था कि गांव से बड़ी मात्रा में दूधिये शहर में घर-घर पहुंचाकर अच्छी कमाई कर रहे थे उसके गांव के भी कुछ लोग हैं जो ये काम करते हैं। उनसे अनुभव जानकर उसका विचार था कि दूध का व्यवसाय आसान है। थोड़ी सी खेती में बरसीन लगाकर जानवरों का भोजन उगाया जा सकता और शहर के कई घरों में जहां उसने बेलदारी की उसकी दूध की लगार हो जायेगी। अपनी पत्नी के साथ नये काम की योजना तैयार हो गई।
बैंक और समूह ने की मददः-
समूह में सीआईएफ और बैंक की लिमिट स्वीकृत हो चुकी थी, द्रोपती ने 10 हजार रूप्ये समूह से लोन लिया। कुछ रकम खुद की ओर से भी जुटाकर 4 से 5 लीटर दूध देने वाली एक भैंस खरीदी। दूध का दही और मठा बनाया गया। सबसे पहले तो उसके पति सप्ताह में दो-तीन दिन शहर में फेरी लगाकर दही मठा और घी बैच लेते। जल्द ही समूह की रकम चुकता कर 20 हजार रूप्ये और लिया गया। और 8 लीटर वाली एक और भैंस घर में आ गई। क्रमशः 50 हजार रूप्ये बारी-बारी से तीन बार और 70 हजार रूप्या कुल मिलाकर 2.5 लाख रूप्या समूह से लेकर 5 भैंसे और एक जरसी गाय के साथ डेयरी का बड़े पैमाने पर काम शुरू हो गया। उसके पति साइकिल छोड़ अब मोटर साइकिल से प्रतिदिन लगभग 30 से 35 लीटर दूध सप्लाई करने लगे। घर में अब रोज पैसा आता। बच्चों को भी पेट भर दूध, दही मक्खन और घी मिलने लगा अच्छे भोजन से उसके दोनों बेटों की रंगत ही बदल गई। बडे़ बेटे ने तो अपने पापा से भी ज्यादा हाइट गेन की। छोटी बेटी भी स्वस्थ और एक्टिव दिखने लगा। चार कमरों का पक्का मकान बनकर तैयार हो गया। हालांकि मकान के निर्माण में मुख्यमंत्री आवास योजना की भी मदद थी। बडे़ बेटे को कॉम्पटीशन की तैयारी के लिए अच्छी कॉचिंग की आवश्यकता थी। सागर में बच्चे को कॉचिंग में एडमिशन दिला दिया गया। शादी-ब्याह में जेवरों की कमी खलती थी आमदनी बढ़ी तो धीरे धीरे उसने सोने का मंगलसूत्र, पानचाली, करधौनी, पायल खरीद लिये। पति के गले में भी अब सोने का ताबीज लटकने लगा। समूह में जुड़कर खुशहाली से अब द्रोपती खुश है। उसकी आमदनी ढाई हजार से बढ़कर पच्चीस हजार रूप्या जो हो गई है। अब उसके सभी सपने धीरे-धीरे पूरे होने लगे हैं। उसकी समूह से जुड़ी पांचवीं कक्षा तक उत्तीर्ण माया बाई ने भी पहले 10 हजार फिर 20 हजार और फिर 50 हजार रूप्ये लेकर सब्जी की खेती और सब्जी का व्यापार शुरू किया। घर के खर्च के लिए 1 भैंस खरीद वे गांव में उंगने वाली सारी सब्जी खरीद लेती हैं। जो सब्जियां गांव में नहीं मिलती वे ट्रॉली में भरकर मंडी से ले आतीं उनका सब्जी का बड़ा व्यापार हो गया है। वे भी बीड़ी मजदूरी को छोड़कर 12 से 15 हजार रूप्ये प्रतिमाह सब्जी से कमा रहीं हैं।
डॉ. इच्छित गढ़पाले मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत- ने बताया कि स्व. सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं मे स्वाबलबन की भावना का विकास हुआ है। समूह से ऋण लेकर द्रोपती जैसी अनेक महिलाओं ने स्वयं के व्यवसाय की स्थापना करके खुद के साथ साथ परिवार के अन्य सदस्यों को भी उस रोजगार से जोड़ा और अपने पारिवारिक आर्थिक जीवन में सुधार किया है।
श्री दीपक आर्य, जिला कलेक्टर, सागर का कहना है कि स्वयं सहायता समूह से जुड़कर सागर जिले की महिलाओं ने अपनी नेतृत्व क्षमता गरीबी के दुष्चक्र से बाहर आने के प्रयासों को सफल किया है। द्रोपती जैसी महिलाओं ने समाज में ये उदाहरण पेश किया है कि यदि व्यक्ति ठान ले तो असंभव कुछ भी नही है। जिला प्रशासन की ओर से पात्र हितग्राहियों को योजनाओं से लाभ लेकर अपने आर्थिक उन्नयन के लिए जिला प्रशासन सदैव मदद के लिए तैयार हैं।
 
(35 days ago)
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