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कड़क कमाई से आदिवासी महिलाओं के जीवन में सुखद बदलाव “खुशियों की दास्तां”
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ग्वालियर | 12-नवम्बर-2021
     स्व-सहायता समूहों से जुड़ीं ग्राम सिरोल की महिलाओं की अतिरिक्त आमदनी को वहाँ के लोग कड़क कमाई कहते हैं। यह आमदनी गाँव की सहरिया जनजाति की महिलाओं को कड़कनाथ मुर्गीपालन से हो रही है। इसलिये ग्रामीणों ने इस कमाई को कड़क कमाई की संज्ञा दी है।
    कड़कनाथ मुर्गे का नाम आते ही लोगों का ध्यान अकसर मध्यप्रदेश के झाबुआ, धार व अलीराजपुर तथा छत्तीसगढ़ के जिलों की ओर जाता है। मगर ग्वालियर जिले की जनपद पंचायत डबरा के ग्राम सिरोल की ख्याति भी कड़कनाथ मुर्गीपालन से ग्वालियर-चंबल अंचल में बढ़ गई है। मध्यप्रदेश की विशेष पिछड़ी जनजातियों में सुमार सहरिया जनजाति से ताल्लुक रखने वाली ग्राम सिरोल की महिलायें राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत बने स्व-सहायता समूहों से जुड़कर कड़कनाथ मुर्गी पालन का काम कर रही हैं। शुरूआत में इस गाँव की 59 सहरिया महिलाओं को स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय एवं पशुपालन विभाग के जरिए कड़कनाथ के 40 - 40 चूजे दिलाए गए थे। चूजे जब बड़े होकर कड़कनाथ मुर्गा बने तो हर मुर्गा 800 से लेकर 1000 रूपए तक बिका। साधारण से चूजों से इतनी आमदनी होगी, ऐसा तो इन महिलाओं ने सपने में भी नहीं सोचा था।
    आमदनी बढ़ी तो कड़कनाथ मुर्गी पालन के प्रति आदिवासी महिलाओं की रूचि भी बढ़ती गई। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत बाद में हर महिला को 100 – 100 चूजे मुहैया कराए गए। जाहिर है महिलाओं की आमदनी को पंख लग गए हैं। कड़कनाथ मुर्गी पालन से जुड़ी हर महिला को कुछ ही महीनों में 25 से 30 हजार रूपए की अतिरिक्त आमदनी हुई। कड़कनाथ मुर्गी का अंडा 30 से 40 रूपए, मुर्गा 800 से 1200 रूपए और मुर्गी 3000 रूपए तक बिकती है।
    सिरोल के लक्ष्मीबाई स्व-सहायता समूह से जुड़ीं श्रीमती रामबाई आदिवासी बताती हैं कि हमने बेमन से 40 चूजे लिए थे। मुर्गी पालन के प्रति उनका पुराना अनुभव ठीक नहीं था। पर इस बार उनकी आशंका निर्मूल साबित हुई। वे कहती हैं कि हमारे चूजे 6 से 8 महीने में ही बड़े हो गए। जब लोगों को पता चला तो हमारे घर पर कड़कनाथ मुर्गा व अंडे खरीदने के लिये लोगों की कतार लगने लगी। हमने 800 से 1000 रूपए प्रतिकिलो के हिसाब से मुर्गे बेचे। लॉकडाउन के समय तो लोग 2000 रूपए तक का मुर्गा खरीदकर ले गए। अंडों से पुन: चूजे निकले हैं जो धीरे-धीरे मुर्गे और मुर्गियों का रूप ले रहे हैं। रामबाई की तरह गाँव की अन्य 58 आदिवासी महिलायें भी कड़कनाथ मुर्गीपालन से इतनी ही कमाई कर रही हैं।
    सिरोल गाँव में कड़कनाथ मुर्गी पालन के सफल कारोबार से प्रेरित होकर जिले के अन्य ग्रामों की आदिवासी महिलायें भी इससे जुड़ गईं हैं। वर्तमान में ग्वालियर जिले के 19 ग्रामों में 961 हितग्राहियों द्वारा सफलतापूर्वक कड़कनाथ मुर्गी पालन व्यवसाय किया जा रहा है। खासतौर पर आदिवासी दफाईयों में निवासरत जनजाति की महिलायें कड़कनाथ मुर्गी पालन से जुड़ी हैं। इनमें छीमक दफाई, महाराजपुर दफाई, रजियावर दफाई, बारोल दफाई, कल्याणी दफाई व सुनवाई दफाई शामिल हैं। स्व-सहायता समूहों से जुड़कर कड़कनाथ पालन कर रहीं महिलाओं को किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग की आत्मा योजना के तहत भी चूजे मुहैया कराए गए हैं।
प्रोटीन से भरपूर कड़कनाथ मुर्गा को काले रंग रूप के कारण कालीमासी भी कहा जाता है। नॉनवेज (माँसाहारी) भोजन पसंद करने वालों में कड़कनाथ मुर्गे की खासी माँग है। इसी बात को ध्यान में रखकर ग्वालियर जिले में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत कड़कनाथ मुर्गीपालन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
   कड़कनाथ मुर्गे की इतनी माँग है कि ग्वालियर शहर के बड़े-बड़े होटल व रेस्टोरेंट के संचालक गाँव में पहुँचकर मुर्गे खरीद लाते हैं। इसलिये मुर्गे बेचने के लिये बाजार की कोई समस्या नहीं है। फिर भी महिलाओं को बाजार मुहैया कराने के लिये उन्हें “सर्व ग्वालियर” से जोड़कर ग्वालियर स्थित संभागीय हाट बाजार में कड़कनाथ मुर्गा विक्रय केन्द्र खोला गया है। प्रदेश की विशेष पिछड़ी जनजातियों में शुमार सहरिया से ताल्लुक रखने वाली ग्वालियर जिले की आदिवासी महिलायें कड़कनाथ मुर्गीपालन से महिला सशक्तिकरण की नई दास्तां लिख रही हैं।

हितेन्द्र सिंह भदौरिया
 
(72 days ago)
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