समाचार
|| कोविड 19 टीकाकरण अभियान सतत जारी || पीएम किसान सम्मान निधि की 10 वीं किस्त होगी जारी || बनखेडी के 21 ग्रामों में ड्रोन फ्लाई का कार्य पूर्ण || 12 जनवरी को व्यापक स्तर आयोजित होगा रोजगार मेला || आज का न्यूनतम तापमान 7 डि.से. || वन विहार राष्ट्रीय उद्यान एवं जू वन, वन्य-जीव, पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन के सफल प्रयास || औद्योगिक मजबूती के लिए हर माह साठ करोड़ की मदद || कोरोना के बढ़ते प्रकरणों को देखते हुए पुख्ता रहे नियंत्रण की व्यवस्थाएँ - मुख्यमंत्री श्री चौहान || भारतमाला परियोजना में म.प्र. के लिए 876 करोड़ की स्वीकृति पर मुख्यमंत्री श्री चौहान ने माना केन्द्र का आभार || मुख्यमंत्री श्री चौहान ने जल जीवन मिशन में राशि स्वीकृति के लिए केन्द्र का आभार माना
अन्य ख़बरें
शहीद टंट्या मामा की शहीद स्थली जबलपुर जेल से पवित्र मिट्टी खण्डवा ले जाई जाएगी
-
डिंडोरी | 25-नवम्बर-2021
   अमर शहीद टट्या मामा की केन्द्रीय जेल, जबलपुर स्थित शहीद स्थली से पवित्र मिट्टी सम्मानपूर्वक खण्डवा ले जाई जाएगी। इस गरिमामय कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रदेश के लोक निर्माण कुटीर एवं ग्रामोद्योग और जबलपुर जिले के प्रभारी मंत्री श्री गोपाल भार्गव होंगे। कलेक्टर श्री कर्मवीर शर्मा ने आज सेंट्रल जेल जबलपुर का दौरा कर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री टंट्या मामा की शहीद स्थली और कार्यक्रम स्थल को देखा।
"महान क्रांतिकारी टंट्या मामा"
   जननायक टंट्या मामा का जन्म वर्ष 1842 में तत्कालीन मध्यप्रांत और आज के मध्यप्रदेश के खंडवा जिले के पंधाना तहसील के ग्राम बड़ौदा अहीर में एक भील जनजाति परिवार में हुआ। उनके पिता जी का नाम भाऊ सिंह भील था। वह कृषि कार्य द्वारा अपनी आजीविका अर्जित करते थे।
   अंग्रेजों द्वारा लाई गई नई भू-राजस्व व्यवस्था के कारण इस क्षेत्र के जनजातीय समाज को मुश्किलें उठानी पड़ रही थीं। इसी शोषणकारी ब्रिटिश भू-राजस्व व्यवस्था के चलते टंट्या एक विवाद में फँसे जिसके बाद ब्रिटिश राज्य के दमनकारी स्वरूप से उनका प्रत्यक्ष साक्षात्कार हुआ। उसके बाद एक आम जनजातीय व्यक्ति एक महान क्रांतिकारी योद्धा के रूप में परिवर्तित हो गया।
   जननायक टंट्या ने ब्रिटिश शासन के द्वारा ग्रामीण जनजातीय समाज के विरूद्ध हो रहे शोषण और अत्याचारों के विरूद्ध आवाज उठाई। उन्हें अनेक बार पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर यातनाएँ दी गई परन्तु उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा। वर्ष 1874 से 1889 तक वह अपने अत्यंत सीमित साधनों से शक्तिशाली ब्रिटिश शासन का पुरजोर विरोध करते रहे। अगस्त 1889 में उन्हें गिरफ्तार कर पहले इंदौर और फिर 28 अगस्त को जबलपुर जेल भेज दिया गया। यहीं उनपर मुकदमे की कार्यवाही चलाई गई और त्वरित कार्यवाही करते हुए जबलपुर के सेशन जन लिंडसे नील ने 18 अक्टूबर को उन्हें फाँसी की सजा सुना दी। ऐसा माना जाता है कि केन्द्रीय जेल जबलपुर में 4 दिसंबर को फाँसी देने के बाद इंदौर के निकट पातालपानी रेलवे स्टेशन के नजदीक उनका शव फेंक दिया गया था, जहाँ स्थानीय निवासियों द्वारा उनके सम्मान और स्मृति में एक मंदिर का निर्माण कराया गया। द न्यूयार्क टाइम्स के 10 नबम्बर 1889 के अंक में टंट्या मामा के विषय में प्रमुखता से खबर प्रकाशित हुई थी। इसमें उन्हें भारत का रॉबिनहुड बताया गया था।  इसका कारण यह बताया जाता है कि टंट्या मामा अंग्रेजों का सरकारी खजाना और अंग्रेजों के चाटुकारों का धन लूटकर जरूरत मंदों और गरीबों में बाँट देते थे। उनके लोकोपकारी कार्यों के चलते वह मामा के नाम से विख्यात हुए। जनजातीय समाज के लिए किये गये उनके कार्यों के प्रति उनकी इस लगन ने उन्हें एक लोकदेवता का दर्जा प्रदान किया है।
(56 days ago)
डाउनलोड करे क्रुतीदेव फोन्ट में.
डाउनलोड करे चाणक्य फोन्ट में.
पाठकों की पसंद

संग्रह
दिसम्बरजनवरी 2022फरवरी
सोम.मंगल.बुध.गुरु.शुक्र.शनि.रवि.
272829303112
3456789
10111213141516
17181920212223
24252627282930
31123456

© 2012 सर्वाधिकार सुरक्षित जनसम्पर्क विभाग भोपाल, मध्यप्रदेश             Best viewed in IE 7.0 and above with monitor resolution 1024x768.
Onder's Computer