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रेज्ड बेड पद्धति से बुआई करने पर एक से डेढ़ क्विंटल प्रति बिघा होता है अधिक उत्पादन -उन्नत कृषक शकिल अहमद (सफलता की कहानी)
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आगर-मालवा | 01-फरवरी-2018
 
 
     आगर-मालवा जिले के ग्राम पिपलोनकलां के रहने वाले शकिल अहमद ने परम्परागत खेती को छोड़कर आधुनिक तरीके से खेती कर आज न सिर्फ अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार किया, बल्कि क्षैत्र में उन्नत कृषक रूप में भी अपनी पहचान स्थापित की। शकिल अहमद ने अपनी मेहनत और लगन से कृषि को लाभ का धन्धा बनाने के सपने को साकार कर दिखाया।
   शकिल अहमद बताते है कि वह पूर्व में पुरानी पद्धतियों से कृषि कार्य करते थे, जिससे कृषि लागत के अनुरूप लाभ नहीं प्राप्त होता था। परम्परागत तरीके से कृषि में बिजोपचार नहीं करना तथा अवश्यकता से अधिक बीजो की बुआई करने से प्रति हेक्टेयर अधिक बीज की आवश्यकता होती थी। साथ ही पौधों की संख्या अधिक होने से निराई-गुडाई आदि में परेशानियों का सामना करना पड़ता तथा उत्पादन मे भी कोई बढोत्तरी नहीं होती थी। लागत के अनुरूप लाभ प्राप्त न होने से कृषि कार्य की ओर रूझान कम होता जा रहा था। इस दौरान कृषि विभाग के मैदानी अमले के सम्पर्क में आकर कृषि नई तकनीकी के बारे में जानकारी प्राप्त की।
   शकिल अहमद बताते है कि उन्हें चना का आई.पी.एम. प्रदर्शन मिला जिसे रेज्ड बेड पद्धति से बोया गया। सामान्य पद्धति से जहां 60-80 कि.ग्रा./हेक्टेयर की दर से बीज लगता जो, घटकर मात्र 40 कि.ग्रा./हेक्टेयर रह गया तथा पौधों से पौधों एवं पंक्ति से पंक्ति की दूरी अधिक होने से निराई-गुडाई प्रकिया आसान हो गई। सिंचाई के लिये पर्याप्त पानी की उपलब्धता न होने के कारण शासन की योजनान्तर्गत कृषि विभाग से स्प्रिंकलर प्राप्त कर फव्वारा सिंचाई को महत्व दिया। रेज्ड बेड पद्धति से बुआई में कम बीज एवं फव्वारा सिंचाई से फसलों को भरपूर सिंचाई करना आसान हो गया। इस तरह से कृषि लागत में कमी हुई, साथ ही भरपूर फसल का उत्पादन होने लगा। उन्होंने बताया कि रेज्ड बेड पद्धति सामान्य विधि से सस्ती है जिसमें असमय वर्षा या जल भराव की स्थिति में रेज्ड बेड के बीच की कुंड मे पानी भर जाता है जिसका मेढ़ पर उगे पौधो पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ता। जिससे पौधे सड़ने एवं गलने से बच जाते हैं और फसल कमजोर नहीं होती है। जबकि कुंड में एकत्र जल तनाव की स्थिति पुनः पौधों को लाभ पहुंचाता है। जबकि आवश्कता पड़ने पर सिंचाई करना भी आसान होता है एवं प्रति बीघा एक से डेढ़ क्विंटल अधिक उत्पादन मिलता हैं। वर्तमान में शकिल उद्यानिकी फसलो की भी बुआई कर लागत के अनुरूप लाभ प्राप्त कर रहे है।
(144 days ago)
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