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जिले में मत्स्य पालन के क्षेत्र में अभिनव प्रयास
प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से मिलेगा 250 लोगों को मिलेगा रोजगार, होगी आर्थिक उन्नति
अनुपपुर | 05-फरवरी-2018
 
   
 
   प्राकृतिक संसाधनों का यदि बेहतर उपयोग किया जाय तो गरीब लोगों को रोजगार तो मिलेगा ही, साथ ही वह उनकी आर्थिक उन्नति का साधन भी बन सकता है। जिले में खनिज प्रचुर मात्रा में मिलता है, कोयले की खदाने जहां से कोयला निकल चुका है, वहां काफी मात्रा में पानी एकत्र रहता है। खदानों की गहराई अधिक होने के कारण मछली पालन संभव नही हो पाता। पानी के बेहतर उपयोग करने के लिए जिला प्रशासन द्वारा जिला खनिज मद से मत्स्य पालन विभाग के माध्यम से केज कल्चर प्रारंभ करने का निर्णय लिया है। ऐसा कार्य जिले की 10 बन्द पड़ी कोयला खदानों का जल परीक्षण कराकर उपयुक्त पाये जाने पर केज कल्चर प्रारंभ करने का निर्णय लिया गया।
   सहायक संचालक मत्स्य ने बताया कि केज कल्चर के माध्यम से एक मत्स्य उद्योग सहकारी समिति सदस्य संख्या 50 तथा डोला रामनगर क्षेत्र की खदानों में तथा कोतमा जमुना क्षेत्र की कोयला खदान में सहकारी समिति के माध्यम से केज कल्चर किया जायेगा। इससे 250 लोगों को प्रत्यक्ष एवं 685 व्यक्तियों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा। प्रदेश में कोयला की खदानों में पहली बार किये गये प्रयास की तैयारियों में अब तक हितग्राहियों का चयन, उनका प्रशिक्षण, केज निर्माण का कार्य कर लिया गया है। मत्स्य बीज इसी माह छोड़ा जायेगा। यह वर्ष में दो बार छोड़ा जायेगा। केज से वर्ष में 560 मीट्रिक टन मछली उत्पादन होगा। जिसकी बाजार कीमत लगभग 56 लाख रु. है।
   केज एक प्रकार का तैरता हुआ पिंजड़ा है, जिसे प्लास्टिक के डिब्बों को पाइप के सहारे तैयार किया जाता है, जिसमें जाल लगा रहता है, जिससे छोटे तालाब के रुप में वह पानी में तैरता रहे। इसमें मछली के बीज डालकर उन्नत किस्म का फीड दिया जाता है। 6 महीने में मछली एक किलो का वजन प्राप्त कर लेती है। साथ ही नियत स्थान में मत्स्य पालन करने से मत्स्याखेट में आसानी होती है। उत्पादन बढ़ने से जिले में मोबाइल मार्केटिंग, फिश फीड मील, कियोस्क आदि खुलने के रास्ते खुलेंगे। इसके साथ ही इक्वा टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा तथा जिले में जलीय मनोरंजन गतिविधियों का विकास होने से स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा।
(193 days ago)
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