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जिला :: पन्ना
जिले का इतिहास
8/7/2018 5:42:44 AM
 
पन्ना जिले का इतिहास

   पन्ना देश का वह पहला स्थान है, जहां हीरे के भंडार का पता चला। इस स्थान का उल्लेख प्राचीन ग्रंथ रामायण तथा अनेक पुराणों जैसे विष्णु, भविष्य पुराण आदि से प्राप्त होता है। इस पुराणों में पन्ना का प्राचीन नाम पद्मावती पुरी बताया गया है। वाल्मिकी रामायाण के 41 वें सर्ग में सुग्रीव ने इसका उल्लेख किलकिला खंड के रूप में किया है। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह क्षेत्र राजा दधीचि की राजधानी थी। इसे सतयुग के राजा पद्मावती की राजधानी भी कहा जाता था। यहां की ग्राम पंचायत अहिरगवां स्थित सारंग धाम  भगवान श्री राम के वनगमन मार्ग में शामिल है। यहां भगवान राम का वनवास के दौरान काफी समय रहने का उल्लेख भी मिलता है। पौराणिक कथाओं में यहां की भूमि का उल्लेख है। सतयुग में भगवान शिव पार्वती के वर्तमान बुन्देलखण्ड भ्रमण करने और विष धारण करने की बात आने का उल्लेख किया जाता है। कहा जाता है, कि महाभारत के पांडवों ने अपने वनवास का समय पन्ना के जंगलों में व्यतीत किया था। यहा वह स्थान पण्डव की गुफाओं तथा पाण्डव फाल के नाम से जाना जाता है।
   मध्यकाल में किलकिला नदी की दूसरी तरफ पनरा नाम का नगर था जो गोंड राजाओं की राजधानी थी। जनश्रुति है, कि स्वामी प्राणनाथ ने मध्य काल के महान योद्धा राजा छत्रसाल को पन्ना की हीरे की खानों के बारे में बताया था। इससे छत्रसाल के राज्य की आर्थिक स्थिति सुधरी थी। पन्ना को अपनी राजधानी बनाने के लिए स्वामी जी ने राजा छत्रसाल को प्रेरित किया था और उनके राज्याभिषेक की व्यवस्था भी की थी। उन्होंने ही बुन्देलखण्ड राज्य की स्थापना की थी। जिले का संबंध स्वतंत्रता सग्राम के इतिहास से भी जुडा है। आजादी के प्रमुख क्रांतिकारी पं. चन्द्रशेखर ने अज्ञातवास का कुछ समय बिताया था।
   यह जिला सुरम्य पर्वत मालाओं के मध्य बसा है। जो पूरी दुनिया में उज्ज्वल हीरों की खदानों के लिए जाना जाता है। पन्ना जिला मुख्यालय मंदिरों के नगर के रूप में प्रसिद्ध है। यहां पन्ना राष्ट्रीय उद्यान है, जो बाघ पुनर्स्थापना के लिये प्रसिध्द है। इसमें बाघ संरक्षित क्षेत्र, केन घडियाल अभ्यारण्य, पाण्डव प्रपात आदि है। शासन द्वारा इस नगर को पवित्र नगर घोषित किया गया है।
कला
पुरातन वैभव 
           
       जिले का इतिहास पौराणिक काल से मिलता है। जिसके चलते यहां अनेकानेक काल की पुरा सम्पदा बिखरी पड़ी है। यहा प्रागैतिहासिक काल, बौद्ध-जैन काल, गुप्तकाल, राजपूत काल, चंदेल काल और आधुनिक काल के अनेक स्थापत्य के साक्ष्य मिलते हैं। इनमें बहुत से स्थान प्रदेश शासन और केन्द्र शासन द्वारा संरक्षित है। जिला मुख्यालय पर स्थापित पुरातत्व संग्राहालय में अनेक कालों की कला के नमूने संग्रहित किये गये हैं। इसके अलावा जिले में अन्य पुरा संग्रह केन्द्र स्थापित है। केन्द्रीय पुरातत्व विभाग द्वारा गुनौर जनपद के ग्राम नचने में स्थापित भगवान शिव के चौमुख मंदिर को संरक्षित किया गया है।
     यह जिला मुख्यालय सतना रेलवे स्टेशन से 72 किलोमीटर एवं छतरपुर जिले के खजुराहो रेलवे स्टेशन से 40 किलो मीटर की दूरी पर स्थित है। यह प्रकृति प्रदत्त सम्पदा, वन एवं खनिज के साथ पुरा वैभव से परिपूर्ण है। यहां की रत्न गर्भा धरती अनेकों ऋषि मुनियों की तपोभूमि एवं वीर योद्धाओं की कर्मस्थली रही है। पाण्डव की गुफाये द्वापर काल के अवशेष आज भी शेष है।
    जिला मुख्यालय पर श्री प्राणनाथ जी मंदिर, श्री जुगुल किशोर जी मंदिर, श्री बल्देव जी मंदिर, श्री गोविन्दजी मंदिर, जगदीश स्वामी मंदिर, श्री राम जानकी मंदिर के साथ अनेक छोटे-बड़े मंदिर है। यहां के मंदिरों में हर तीज-त्यौहर पर आस-पास के जिले से लोग दर्शनार्थ आते हैं। वही शरद पूर्णिमा के अवसर पर अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक मेले का आयोजन होता है। इस मेले में देश-विदेश से भक्तगण आते है। यह मेला पूरे सप्ताह चलता है। जिला मुख्यालय पर पुरी की तरह रथ यात्रा पर्व का आयोजन होता है। यह रथ यात्रा जगदीश स्वामी मंदिर से प्रारंभ होकर ग्राम पंचायत जनकपुर स्थित श्री जगन्नाथ स्वामी मंदिर जाती है जहां विवाह के उपरांत वापिस जगदीश स्वामी मंदिर में पुनः आयोजन होता है। जिले में श्रृद्धालुओं का आना जाना निरंतर बना रहता है।
 
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